महायुद्ध : गणित बनाम मैं

Poems



उड़ती-उड़ती खबर थी आयी
गणित ने है बोला धावा
सैनिक, हथियार सब थे तैयार
नुकीली छिली पेंसिल, स्केल, कंपास सब ने कहा आज न मानेंगे हार


ठानी मन में आज अमर मैं होकर रहूँगा
मीठी दही का अमृत जो है चखा
सबका सैट आएगा अलग
आज इस युद्ध में न कोई बंधू, न कोई सखा


पंडित ने जो सुबह चन्दन का तिलक लगाया
अमरेंद्र बाहुबली यानी की मैं जैसा महसूस कर पाया
सोचा अब तो किसी बलवान को दोस्त बनाना होगा
जीरो को अपना हाल बताना होगा


जीरो तो अपनी अकड़ में रहता
हर पल कहता – मैं न सहता
किसी के जो लग जाऊ पीछे तो मालामाल कर जाऊँ
किसी के जो लग जाऊँ आगे, पल में उसका भाव गिराऊं


हाइट और डिस्टेंस में हाथ है साफ़
तो इस तरह पहले सवाल के छुड़ाए छक्के
सोचा प्रताड़नाओं का चुन-चुन के बदला लूँगा
आज नहीं करूँगा मैं किसी को माफ़


आज तो हर सवाल को हत्थे चढ़ाना है
दिल को दूर रख दिमाग को लड़ाना है
तभी आँख मुखबिर ने दिया पैगाम
दूसरे नंबर पर विद्रोहियों ने इंटीग्रल को आगे बढ़ाना है


बस उसी पल थी हिम्मत टूटी
लगा आज तो है किस्मत ही रूठी
जैसे-तैसे किया सिक्वेंसिंग और सीरीज का सामना
चौथे नंबर पर थेओरम चिमड़ गयी जैसे कोई प्रेत-आत्मा


उस दिन फ्रैक्शन ने भी की गद्दारी
मिल गया जाके डेसीमल के साथ
मानो जैसे मुझे देख बोला हो
आज लेंगे इसको हाथो-हाथ


सर्किल, स्क्वायर तक तो बात थी हाथ में
लगा आखिरी आशा बाकी है साथ में
सिलिंडर, कोन के आने पर हुआ मैं पूरा हताश
अरमानो का महल गिरा मेरा जैसे हो ताश


युद्धभूमि में हुआ डिफेंशिअल इक्वेशन मेरे सर पर सवार
करता रहा वो मुझ पर वार पर वार
इस महायुद्ध को देखकर टीचर भी रह जाएंगे हक्के बक्के
जमा देंगे कॉपी पर लाल स्याही से जीरो के थक्के


इस युद्ध में ६७ महानुभावियों का खून बहा
किसी के साथ न हो जो मैंने सहा
साइन कोस था मेरा हुक्म का इक्का
लुढ़कता-पुढ़कता ३३ के खाने में चल गया सिक्का


अंतत.. मैं विजयी रहा
मैंने दुश्मन के आगे घुटने न टेके
घर पंहुचा तो पता चला
मम्मी दरवाजे पर खड़ी है जूतों का हार लेके

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